Monday, September 16, 2013

आर. ई.एस. नियम 1970 के नियम 28 उपनियम 7 की व्याख्या

प्रिन्सिपल के पद पर पदोन्नति का एकमात्र नियम
राजस्थान शिक्षा नियम 1970 का नियम 28/7 की व्याख्या
“यह की ग्रुप ‘डी’ (प्रिन्सिपल) में पदों पर पदोन्नति के लिए ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) एवम् ‘एफ’ (हेडमास्टर/लेक्चरर) में वर्णित पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की सामान्य (कामन) वरिष्ठता उनकी संस्थायी नियुक्ति की तारीख में संदर्भानुसार अवधारित की जाएगी. आयोग का समिति द्वारा चयनित व्यक्तियों की पारस्परिक वरिष्ठता वह होगी जो आयोग या समिति द्वारा निर्दिष्ट की गई है. विभागीय पदोन्नति कोटा के प्रति चयन किए व्यक्तियों की पारस्परिक वरिष्ठता नियम 24 व २५ के अधीन अवधारित की जाएगी,”    
नोट -  ग्रुप के आगे सुविधा हेतु पद का नाम कोष्ठक में दिया गया है >
Ø  प्रिंसीपल = ग्रुप ‘डी’ = ग्रुप ‘घ’
Ø  वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी = वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी = वाईस -प्रिन्सीपल = हेडमास्टर उच्च माध्यमिक विद्यालय = ग्रुप ‘ई’ = ग्रुप ‘ङ’
Ø  हेडमास्टर/लेक्चरर = प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय = ग्रुप ‘एफ’ = ग्रुप ‘च’
Ø  लेक्चरर = प्राध्यापक = व्याख्याता, स्कुल शिक्षा = ग्रुप ‘एफ’ = ग्रुप ‘च’
नियम 28/7 के अनुसार प्रिन्सिपल पद पर पदोन्नति के नियम 28/7 की व्याख्या >
1.   प्रिन्सिपल पद पर पदोन्नति के लिये ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) एवम ग्रुप ‘एफ’ (हेडमास्टर और लेक्चरर) दोनों ही पद पात्र है.
2.   “प्रिन्सिपल पद पर पदोन्नति के लिये ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) व ग्रुप ‘एफ’   (हेडमास्टर और लेक्चरर) के पद पर नियुक्त व्यक्तियों की कामन सीनियरिटी उनकी संस्थायी नियुक्ति की तारीख में संदर्भानुसार अवधारित की जानी चाहिए”.
3.   इस नियम में पदोन्नति के पात्र व्यक्ति की वरिष्ठता पर विशेष जोर दिया गया है.
4.   इस नियम में यही विशेष ध्यान देने योग्य बात है की पदोन्नति के पात्र की संस्थायी नियुक्ति को वरिष्ठता का आधार माना गया है, किसी ग्रुप या पद को वरिष्ठता का आधार नहीं माना गया है. अर्थात यहाँ व्यक्ति को नियुक्ति तिथि के आधार पर वरिष्ठ माना है न की किसी पद पर पहुँच जाने से. जबकि रेसा द्वारा हेडमास्टर सेकण्डरी स्कुल को लेक्चरार से उच्च पद बताया जा रहा है.
5.   इस नियम में स्पष्ट है की ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) के पद पर पदोन्नति का अर्थ ग्रुप ‘डी’ प्रिन्सिपल के पद पर पदोन्नति का पड़ाव नहीं है. क्योंकि ग्रुप ‘ई’ भी पदोन्नति के पात्रों में से एक है. लेकिन पूर्व के वर्षों में प्रिंसिपल पद पर पदोन्नति में ग्रुप ‘ई’ को पड़ाव मानकर पदोन्नति की गयी है जो उचित प्रतित नहीं होती है.
6.   इस नियम से यह स्पष्ट होता है कि ग्रुप ‘एफ’ के सदस्यों की (हेडमास्टर/लेक्चरर) पदोन्नति सीधी प्रिन्सिपल (ग्रुप ‘डी’) के पद पर हो सकती है. अर्थात प्रिन्सिपल (ग्रुप ‘डी’) के पद पर पदोन्नति के लिये ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) के पद पर पदोन्नत होना कतई आवश्यक नहीं है. यदि
7.   यदि प्रिन्सिपल के पद पर पदोन्नति के लिये ग्रुप ‘ई’ के (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) पद पर पदोन्नत होना आवश्यक होता तो ग्रुप ‘एफ’ (हेडमास्टर/ लेक्चरर) का सन्दर्भ पदोन्नति के पात्र के रूप में इस नियम में देने की जरूरत ही नहीं थी.
8.    Right Arrow: संलग्न प्रिन्सिपल के पद पर पदोन्नति के लिये ग्रुप ‘ई’ (वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी) के पद को किसी भी प्रकार की वरीयता नहीं दी गयी है. यदि ग्रुप ‘ई’ को पदोन्नति में वरीयता दी गयी होती तो उसका उल्लेख इस नियम में अवश्य ही किया गया होता. जैसे नियुक्ति में न्यूनतम योग्यता से अधिक योग्यता वाले पात्रों को मेरिट में अतिरिक्त अंक दिये जाते है तो इस तथ्य का विशेष उल्लेख किया जाता है. किन्तु ग्रुप ‘ई’ के लिये ऐसा कोई उल्लेख नहीं  है.
9.     जब किसी एक पद पर पदोन्नति के लिये एक से अधिक पात्र होते है तो पदोन्नति के स्तर पर सभी पात्र समकक्ष व समस्तर पर माने जाते है. नियम 28 उपनियम 7 में भी सभी पात्रों को  समकक्ष व समस्तर पर रखते हुए “सामान्य (कामन) वरिष्ठता उनकी (ग्रुप ‘ई’ एवम् ‘एफ’ में वर्णित पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की) संस्थायी नियुक्ति की तारीख में संदर्भानुसार अवधारित किये जाने का प्रावधान रखा गया है.

संस्थायी नियुक्ति की तारीख >  किसी भी कार्मिक की ‘राजस्थान शिक्षा सेवा’ में ‘पहली नियुक्ति की तारीख’ चाहे वह सीधी भर्ती से नियुक्त हुआ हो अथवा पदोन्नति से राज्य सेवा में पहुंचा हो. उसकी राज्य सेवा में नियुक्ति तिथि ही संस्थायी नियुक्ति तारीख होती है.

Friday, September 13, 2013

प्राध्यापकों ने ली वेतनमान के सम्बन्ध में हाईकोर्ट कि शरण

http://udaipurtimes.com/hindi/lecturers-turns-to-high-court-for-help/

प्राध्यापकों ने ली वेतनमान के सम्बन्ध में हाईकोर्ट कि शरण

 
छठे वेतन आयोग में स्कूली प्राध्यापकों की ग्रेड पे तथा पे बैंड को प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय से कम रखने के राज्य सरकार के फैसले को कुछ प्राध्यापकों ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी है और प्राध्यापकों का वेतनमान प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय के समकक्ष किए जाने की अभ्यर्थना की है। उदयपुर, राजसमंद तथा धौलपुर के प्राध्यापकों द्वारा दायर किए गए वाद संख्या 10778/2013 में न्यायालय ने पिछले शुक्रवार को नोटिस जारी कर राज्य सरकार से इस संबंध में दो सप्ताह में जवाब देने के लिए कहा है।
वाद में कहा गया है कि प्राध्यापक तथा प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय राजस्थान शिक्षा  सेवा नियम-1970 में उल्लेखित राज्य सेवा के एक ही ग्रुप “एफ” में होने के कारण समकक्ष केडर में हैं तथा दोनों ही पदों की पदोन्नति एक ही पद अर्थात प्रधानाचार्य, उच्च माध्यमिक विद्यालय पर होती है, किंतु वेतनमान भिन्न कर देने से गंभीर विसंगति उत्पन्न हो गई है।
इस वाद में प्राध्यापकों ने गुहार लगाई है कि प्रधानाध्यापकों के संगठन ने 1998 में राज्य सरकार को असत्य व झूठी जानकारी देकर पांचवें वेतन आयोग में वेतन समकक्षता भंग करवाई थी तथा प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय का 6500-10500 से बढवाकर 7500-12000 करवाया इस प्रकार दोनों पदों के प्रारंभिक वेतनमानों में 1000 रुपए का अंतर हो गया जो आज छठे वेतन आयोग में एक बड़ा रूप ले चुका है।
प्राध्यापकों ने अपने वाद में केन्द्रीय विद्यालय संगठन से सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत प्राप्त सूचना तथा केन्द्र सरकार के गजट को इस संबंध में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत कर कहा है कि केन्द्र सरकार में प्रधानाध्यापक माध्यमिक विद्यालय का पद अस्तित्व में ही नहीं है तथा पांचवें वेतन आयोग में केन्द्र में 7500-12000 का वेतनमान उप-प्रधानाचार्य के पद को दिया गया है जो प्राध्यापक तथा प्रधानाध्यापक मावि दोनों ही पदों से एक श्रेणी उच्च का पद है।
इस प्रकार प्रधानाध्यापक मावि का वेतनमान गलत तथ्यों के आधार पर उच्च श्रेणी के पद के समकक्ष किया गया था जबकि राज्य सेवा नियमों की समकक्षता के आधार पर प्राध्यापक तथा प्रधानाध्यापक मावि दोनों ही पदों का वेतनमान समकक्ष होना चाहिए।
वाद में यह भी कहा गया है कि प्रधानाध्यापकों के संगठन ने छठे वेतन आयोग की विसंगतियां दूर करने के लिए गठित कृष्णा भटनागर समिति के समक्ष भी इसी तरह के झूठे तथ्य प्रस्तुत किए थे जिसे भटनागर समिति ने अस्वीकार कर दिया था।
इस अस्वीकृति के बावजूद राज्य सरकार ने प्रधानाध्यापक मावि के पद का वेतनमान केन्द्र सरकार में उच्च श्रेणी के पद उपप्रधानाचार्य के बराबर करके गंभीर वेतन विसंगति पैदा कर दी है, जिससे प्राध्यापकों की पदोन्नति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
रिट में कहा गया की प्राध्यापक व प्रधानाध्यापक मावि दोनों ही पदों पर पदोन्नति वरिष्ठ अध्यापक पद से होती है जिसमें से प्राध्यापक पद की योग्यता स्नातकोत्तर मय शिक्षा  स्नातक है जबकि प्रधानाध्यापक मावि पद की योग्यता इससे कम यानि स्नातक मय शिक्षा  स्नातक ही है। ऐसे में जो कम योग्यताधारी तथा कनिष्ठ वरिष्ठ अध्यापक जब पदोन्नत होकर प्रधानाध्यापक बनता है तो उसे अधिक वेतनमान मिलता है, इसके विपरीत अधिक योग्यताधारी वरिष्ठ अध्यापक को प्राध्यापक पर पदोन्नत होने पर कम वेतनमान मिलता है।
इससे वरिष्ठ अध्यापकों को भी हानि उठानी पड़ रही है। छठे वेतन आयोग में स्कूली प्राध्यापकों की ग्रेड पे तथा पे बैंड को प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय से कम रखने के राज्य सरकार के फैसले को कुछ प्राध्यापकों ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी है और प्राध्यापकों का वेतनमान प्रधानाध्यापक, माध्यमिक विद्यालय के समकक्ष किए जाने की अभ्यर्थना की है
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